Category: कोर्ट ऑर्डर

  • संम्पति के दस्तावेज गुम होना बैंक की लापरवाही : आयोग

    संम्पति के दस्तावेज गुम होना बैंक की लापरवाही : आयोग

    दिल्ली। राज्य उपभोक्ता आयोग ( State Consumer commission) ने कहा है कि लोन के बदले में गिरवी रखें गए फ्लैट या मॉरगेज संम्पति के मूल दस्तावेज (Property original documents) की सुरक्षा की जिम्मेदारी बैंक की है। अगर ये दस्तावेज गुम होते है या क्षतिग्रस्त होते है तो यह बैंक की लापरवाही है। आयोग के अध्यक्ष जस्टिस संगीता डी सहगल और न्यायिक सदस्य राजन शर्मा की पीठ ने राजीव खन्ना और योगेश खन्ना की शिकायत का निपटारा करते हुए यह फैसला दिया।

    क्या था मामला ।
    हरियाणा निवासी राजीव खन्ना और योगेश खन्ना ने गुरुग्राम मे एक फ्लैट खरीदने के लिए एचएसबीसी बैंक (HSBC Bank) से लोन लिया, उन्होने प्रापर्टी के मूल दस्तावेजों के साथ अन्य दस्तावेज भी बैंक में जमा कराए। कुछ समय के बाद उन्होने अपने लोन को केनरा बैंक में ट्रांसफर करा लिया था उपभोक्ता आयोग ने दस्तावेज खो देने पर बैंक को सेवा में कमी का मामला बताते हुए एचएसबीसी बैंक को 11 लाख दस्तावेज खोने और शिकायतकर्ता को प्रताड़ित करने के बदले में देने का आदेश दिया।

  • पति-पत्नी के साथ घर में ही रहेगी लिव इन पार्टनर।

    पति-पत्नी के साथ घर में ही रहेगी लिव इन पार्टनर।

    खंडवा (म.प्र.)। पति-पत्नी के साथ घर में ही रहेगी लिव इन रिलेशनशिप पार्टनर भी रहेगी, उसे पार्टनर के मकान खेत, जमीन में से आधा हिस्सा भी मिलेगा। यह फैसला शनिवार को खंडवा में हुई नेशनल लोक अदालत में हुआ। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने लिव इन रिलेशनशिप को मान्यता देने की पहल को ध्यान में रखते हुए न्यायलय ने समझौते के आधार पर मकान, खेत और पति को भी दोनों के बीच बराबर के हक के साथ बांट दिया।

    मांधाता निवासी बसंत माहूलाल करीब 10 साल से अपनी पत्नी राजकुमारी के अलावा दूसरी महिला से लिव इन रिलेशनशिप में है। पति मे महिला को घर में ही रख लिया था। पत्नी ने इसकी शिकायत की थी। मामला परिवार परामर्श में फेल हुआ। कोर्ट में आने पर ग्राम न्यायधिकारी गंगाचरण दुबे ने इसकी जांच कराई। रिपोर्ट में घरेलू हिंसा होना पाया। तब पति और लिव इन रिलेशनशिप के तहत रह रही महिला को नोटिस जारी हुआ, महिला के पति ने कोर्ट में कहा कि लिव इन रिलेशनशिप कोर्ट की नजर में पाप नही है इसलिए हमारी शर्तो पर भी ध्यान दिया जाए। एसीजेएम व ग्राम न्यायधिकारी गंगाचरण दुबे ने तीनों पक्षों की आपसी सहमति के बाद समझौता कराया।

    समझौते के तहत:- पति दोनों के साथ 15-15 दिन रहेगा, बीच के कमरे में पति रहेगा, दो अलग-अलग कमरों में पत्नी और लिव इन रिलेशनशिप वाली महिला रहेगीं। दोनों के बीच कमरे के बटवारें को लेकर भी पहले असहमति बनी थी क्योकिं विवाहिता पत्नी ने कहा कि मै वामा हूं इसलिए पति के दाएं कमरे में रहूंगी, हिन्दू नारी बांए बैठती है। तीनों के नाम जमीन का बटवारा भी हुआ, जिसके तहत ढाई एकड़ में से 1.25 एकड़ जमीन पत्नी को देनी होगी। जबकि शेष हिस्सा पति रखेगा इसमें तीनों का ही शेयर रहेगा और जमीन बेची नही जाएगी।

    Reference: दैनिक भास्कर, 2 दिसंबर 2013, पेज 01

  • प्रेम संबंधों में सेक्स बलात्कार नहीः कोर्ट

    प्रेम संबंधों में सेक्स बलात्कार नहीः कोर्ट

    मुंबई। बंबई उच्च न्यायलय ने बलात्कार के एक आरोपी को रिहा करते हुए कहा है कि प्रेम संबंधों में यदि लड़की स्वेच्छा से सहमति देकर यौन संबंध बनाती है तो यह बलात्कार नही कहा जा सकता। न्यायमूर्ति साधना जाधव ने 39 वर्षीय महेश कोटियाल की याचिका पर सुनवाई करते हुए उसे बलात्कार के आरोप से मुक्त कर दिया।

    न्यायधीश ने कहा कि शिकायकर्ता पढ़ी लिखी और वयस्क है। याचिकाकर्ता ने उसे विवाह का प्रस्ताव दिया था, वह यह बात अच्छी तरह से जानती थी कि आरोपी उसकी और आकर्षित है, उसने उसका जन्मदिन मनाने के लिए उसके साथ होटल में जाना स्वीकार किया। वह इसके परिणामों से भी वाफिक थी। वह मदद के लिए चिल्लाई नही और न ही उसने विरोध किया। न्यायमूर्ति जाधव ने कहा कि यह कहना उचित नही होगा कि डरा धमका कर लड़की की सहमति हासिल की गई। इन परिस्थितियों में आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत मामला नही बनता। लड़की ने पूछताछ में यह भी स्वीकार किया है कि आरोपी के साथ उसके प्रेम संबंध थे और वह उससे शादी करना चाहती थी। अदालत ने कहा “ ऐसा नही कहा जा सकता कि आरोपी ने विवाह का झूठा वादा करके यौन संबंध बनाए। वह उससे विवाह करना चाहता था। आरोपी शादीशुदा था।

    शिकायतकर्ता ने भी बताया है कि याचिकाकर्ता ने उसे भरोसा दिलाया था कि वह अपनी पहली पत्नी से तलाक लेने के बाद उससे विवाह करेगा। लड़की ने अपनी मां को चार महीने तक नही बताया कि वह गर्भवती है उसने अगस्त 2010 में एक बच्ची को जन्म दिया। 27 मई 2010 को प्राथमिकी दर्ज की गई और याचिकाकर्ता उसी समय से हिरासत में था। उसने बच्ची का पिता होने की बात कभी अस्वीकार भी नही की। अदालत ने आईपीसी की धारा 147 के तहत धोखाधड़ी से जुर्म में उसकी एक साल की सजा बरकरार रखी क्योंकि उसने लड़की से अपने पहले से ही विवाहित होने और अदालत में तलाक की कार्यवाही चलने की बात छुपाकर रखी थी।

    Reference: राष्ट्रीय सहारा, 13 जुलाई 2013, पेज 01

  • मीडिया भी रेप पीड़िता की पहचान जाहिर नही कर सकता- कोर्ट

    मीडिया भी रेप पीड़िता की पहचान जाहिर नही कर सकता- कोर्ट

    नई दिल्ली। क्या आप जानते है कि रेप पीड़िता की पहचान को जाहिर नही किया जा करता है। आईपीसी की धारा 228ए के अनुसार रेप पीड़िता की पहचान को उजागर नही किया जा सकता है। मीडिया को भी इस कानून का पालन करते हुए पीड़िता की पहचान गुप्त रखना होगा।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि रेप पीड़िता की पहचान को गुप्त रखना होगा और कोई काल्पनिक नाम से ही संबोदित किया जायेगा। क्योंकि रेप पीड़िता ने न सिर्फ मानसिक यातना सही है बल्कि उसे भेदभाव का भी शिकार होना पड़ता है। मीडिया में पहचान उजागर करने पर सजा का प्रावधान भी है।    

    Tags: सुप्रीम कोर्ट  आदेश । Supreme Court Order ।  रेप पीड़िता । Rape Victim । पहचान । Identity

  • देश भर के थानों में CCTV कैमरे लगाये: सुप्रीम कोर्ट

    देश भर के थानों में CCTV कैमरे लगाये: सुप्रीम कोर्ट

    2 दिसंबर 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के थानों में CCTV कैमरे लगाने का निर्देश जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनच्छेद 21 के तहत दिए गए जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा के लिए ऐसा किया जा रहा है। थानाध्यक्ष डेटा और CCTV के रखरखाव के लिए जिम्मेदार होगें, और इन रिकॉर्डिंगों को 18 महीने तक रखना होगा।

    न्यायमूर्ति आरएफ नरीमन की अगुवाई वाली पीठ ने केन्द्र सरकार को निर्देश दिया है कि सभी जांच एजेंसियों केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI), राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA), प्रवर्तन निदेशालय (ED), नारकोटिक्स नियंत्रण ब्यूरो (NCB), राजस्व खुफिया विभाग (DRI) और गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (SFIO)  आदि के दफ्तरों मे भी  CCTV लगाए जाए।

  • हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत पर जारी की गाइडलाइन।

    हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत पर जारी की गाइडलाइन।

    प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रदेश में अग्रिम जमानत अर्जी दाखिल करने की गाइडलाइन जारी की है। कोर्ट ने कहा है कि अग्रिम जमानत अर्जी पर पांच रुपये का स्टैम्प लगेगा। गिरफ्तारी की आशंका वाले व्यक्ति की अर्जी हलफनामे के साथ दाखिल होगी।

    अर्जी के दूसरे प्रस्तर में केस क्राइम नंबर, थाना, अपराध की धाराएं दर्ज होंगी। जबकि गैर जमानती अपराध में गिरफ्तारी की आशंका की वजह बतानी होगी। अर्जी के तीसरे प्रस्तर में यह लिखना होगा कि अपराध सीआरपीसी की धारा 438 की उपधारा 6 के अंतर्गत नहीं है। इसी प्रकार अर्जी के चौथे प्रस्तर में यह लिखना होगा कि इससे पहले उसने हाईकोर्ट या किसी अन्य अदालत में अर्जी दाखिल नहीं की है। पांचवे प्रस्तर में यह लिखना होगा कि क्या सत्र न्यायालय में कोई अग्रिम जमानत की अर्जी दाखिल की गयी है, तो उसकी स्थिति क्या है, उससे जुड़ा दस्तावेज भी लगाया जाए। विशेष कार्याधिकारी (आपराधिक) ने एक जुलाई 2019 को इस आशय का आदेश जारी किया है।

    Reference:  दैनिक जागरण, 05 जुलाई 2019, पेज 06

  • प्रदेश में अग्रिम जमानत व्यवस्था फिर से लागू।

    प्रदेश में अग्रिम जमानत व्यवस्था फिर से लागू।

    लखनऊ। अब प्रदेश में गैरजमानतीय अपराध के मुकदमे में गिरफ्तारी पर अग्रिम जमानत मिल सकेगी। मंगलवार को प्रमुख सचिव गृह अरविंद कुमार ने बताया कि दंड प्रक्रिया संहिता 1973 में अग्रिम जमानत संबंधित धारा-438 को फिर से लागू करने के विधेयक का राष्ट्रपति से मंजूरी मिल गई है।

    इस व्यवस्था को वर्ष 1976 में आपातकाल के दौरान खत्म कर दिया गया था। बाद में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड को छोड़कर अन्य राज्यों में अग्रिम जमानत की व्यवस्था बहाल कर दी गई थी। प्रदेश में भी इस व्यवस्था को फिर से लागू करने की मांग हो रही थी, जिसे ध्यान में रखते हुए सरकार ने प्रमुख सचिव गृह की अध्यक्षता में समिति का गठन किया। समिति की रिपोर्ट में की गई सिफारिश के आधार पर दंड प्रक्रिया संहिता संशोधन विधेयक-2018 विधानमंडल में पारित कराकर राष्ट्रपति की अनुमति के लिए भेजा गया था, जिसे राष्ट्रपति ने गत एक जून 2019 को अनुमति प्रदान कर दी गई। संशोधन अधिनियम गत छह जून 2019 से लागू हो गया है। अब अग्रिम जमानत की सुनवाई के दौरान अभियुक्त का उपस्थित रहना जरूरी नहीं होगा। संबंधित मुकदमे में पूछताछ के लिए जब बुलाया जाएगा तब पुलिस अधिकारी या विवेचक के समक्ष उपस्थित होना पड़ेगा। इसके अलावा मामले से जुड़े गवाहों व अन्य व्यक्तियों को न धमका सकेंगे और न ही किसी तरह का आश्वासन देंगे।

    एससी-एसटी एक्ट में नहीं मिलेगी अग्रिम जमानत।
    अग्रिम जमानत की व्यवस्था एससी-एसटी एक्ट समेत अन्य गंभीर अपराध के मामलों में लागू नहीं होगी। आतंकी गतिविधियों से जुड़े मामलों (अनलाफुल एक्टिविटी एक्ट 1967), आफिशियल एक्ट, नारकोटिक्स एक्ट, गैंगस्टर एक्ट व मौत की सजा से जुड़े मुकदमों में अग्रिम जमानत नहीं मिल सकेगी।

    30 दिन में करना होगा निस्तारण

    विधेयक के तहत अग्रिम जमानत के लिए जो भी आवेदन आएंगे उनका 30 दिन के अंदर निस्तारण करना होगा। कोर्ट को अंतिम सुनवाई से सात दिन पहले नोटिस भेजना भी अनिवार्य होगा। अग्रिम जमानत से जुड़े मामलों में कोर्ट अभियोग की प्रकृति, गंभीरता, आवेदक के इतिहास, उसकी न्याय से भागने की प्रवृत्ति आदि पर विचार करके फैसला दिया जाएगा।

    Reference: दैनिक जागरण, 12 जून, 2019, पेज 02